२०२० - एक पेचीदा पहेली
२०२० हर पल अपना रंग बदलता है
गौर कीजिये, यह रोज़ एक नयी तस्वीर दिखाता है
कभी गुदगुदाता, कभी संजीदा हो जाता है
कभी मनचाहा ख्वाब पूरा करता है
कभी अनचाही हकीकतों से रूबरू कराता है
२०२० हर पल अपना रंग बदलता है
कभी कहता है जी भरके जी ले, यह वक़्त लौटेगा नहीं,
वहीँ घरों में कैद कर, महीनों मजबूर करता है यही
२०२० हर पल अपना रंग बदलता है
कहीं अपनों का साथ है, तो कहीं अपनों से दूरी,
अस्पतालों में भीड़, कहीं सड़कों पे वीरानी
ढके मुँह निकले अब सारा शहर
सुबह हो, शाम हो, या भरी दोपहर
कहीं शोर, कहीं व्याकुलता, कहीं हाहाकार,
कहीं शांति, कहीं सन्नाटा, कहीं इंतज़ार
शंख बजे, दीप जले, फूल भी बरसे हज़ार,
पर नहीं मिलकर मना पाए कोई भी तीज त्यौहार
बंद रहे हर धर्म कर्म के द्वार,
और योद्धाओं ने लिए भगवन के अवतार
शक्लें सबकी वही रही, बदल गए किरदार
वीर सैनिक बन, यह कर रहे मानवता की सेवा लगातार
उनका हौंसला, उनका त्याग,
उनका समर्पण भाव अपरम्पार
क्या खुशियाँ आएंगी फिर लौटकर?
क्या बच्चे खेलेंगे फिर खिलखिलाकर?
क्या सब मिलेंगे फिर वह पहली सी मुस्कान लेकर?
क्या सजेंगे फिर बाज़ारें, महफिले, बारातघर?
गुमसुम बैठा है हर इंसान, अपना सुख चैन खोकर
गुज़र गए कितने मौसम महीने, यही सोचकर
जाते जाते, काश २०२०, जाए ये भी बताकर..
ख़त्म कब होगा...
कुदरत का यह अद्भुत, असमान्य, अदृश्य कहर
Kya baat hai.....Your hindi writing is giving tough competition to your English writing. Too good. Waise you should involve yourself in comparative literature. You will rock it.
ReplyDeleteKya kehne kya kehne!
ReplyDeleteBeautiful ...this echoes the thoughts of almost everyone of us....
ReplyDeleteLovely
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